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Wednesday, 21 September 2011

दिल आज अब करता है मेरा थोडा-थोडा


वो हमे देख के मुस्कुराते हैं अब भी थोडा-थोडा ,
और हम ये सोच के रह जाते हैं कि दिल क्यूँ तोडा,



जो सीने से लगा करते थे दौड़ के आकर ,
वो दूर हुए क्यूँ और आखिर क्यूँ मुह मोड़ा,

लगता है मुझको भी अब कुछ-कुछ और थोडा-थोडा ,
कि उसने नही मैंने ही उसका दिल तोडा,

मुझे पता ना था की वो ख्वाहिस -ए- जिस्म लेके आते थे ,
हम तो बेवजह उनकी आँखों में डूब जाते थे ,

अब वो दूर हैं तो महसूस होता है थोडा थोडा
कि ख्वाहिस-ए-जिस्म कि उनकी मैंने क्यूँ तोडा

उनकी होठों कि प्यास क्यूँ ना मैंने महसूस किया
बे आबरू होने कि उनकी चाहत को मैंने क्यूँ छोड़ा ????????

दिल आज अब करता है मेरा थोडा-थोडा,
कि वो लबों पे लब रखे और मै बाँहों में भरूं उसको ,
और रात बीते चुपके चुपके , धीर धीरे और थोडा-थोडा ..

From my lover's poem collection " Tere Liye "

Friday, 9 September 2011

फूल गुलशन का

मै  एक  फूल  हूँ  गुलशन  का,
 जिसे  सब   लोग  सजा  देते  हैं,
हम  खुद   ही   टूट  कर  भी,
दूसरो  को  मजा  देते  हैं,
हमे  तोड़  कर  लोग  गले  का  हर  बना  लेते  हैं,
हमे  तोड़ते  हैं  और  निशान  ए  प्यार  बना  देते  हैं,
हम  ही  हैं  जो  कभी  कभी  गुलशन,
 भी  महका  देते  हैं,
लोग  कभी  कभी  हमे  यादों  मै  बसा  लेते  हैं ,
जरा  सुनो  मुझे  तोड़   लेने  वाले,
रहम  करना  मेरे  उस   माली  पर  भी  ,
जो  हमे   जिन्दगी  देने  के  लिए ,
 अपने  उँगलियों  मै   कांटे  चुभा  लेते  हैं ,
मुझे  शिकायत  है  यह  हर  आने  वाले  से ,
 गुलशन   से  तोड़  गुलदस्ते  क्यूँ  बना  देते   हैं,
 आता  है  जब  घर  मै  कोई  मेहमान  ,
वे  गुलदस्ते  थमा  देते  हैं,

 पूछता  हूँ  मै  जाते  हुए  उस  मेहमान  से ,
बताइए  कि  मेरी  खता  क्या  है  ??
जाते  हुए  किसी  के  घर  से 
 क्यूँ  हम  फूलों  को  ही  पैरों  से  दबा  देते  हैं ???