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Wednesday, 21 September 2011

मै नारी हूँ

मै नारी हूँ
अक्सर मै इसी सोच में खो जाती हूँ
क्या मुझे वो अधिकार मिला है ?
मै जिसकी अधिकारी हूँ ?
मै नारी हूँ

 मनु कि  अर्धांगिनी मै
विष्णु- शिव कि संगिनी मै
मै अक्सर सोचा करती हूँ
क्या मै लक्ष्मी  और दुर्गा की अवतारी हूँ ??

 मै धर्म-धारण की प्रतिमूर्ति हूँ
मै सहनशक्ति की मूर्ति हूँ
जब अर्ध पुरुष हो कोई तो  मै ही उसकी पूर्ति हूँ
फिर भी जब जब पौरुष किसी का जलता है
तो सोचती हूँ क्या सिर्फ जलन की मै अधिकारी हूँ ??

जब जब दुर्योधन कोई ललकार लगाता है ,
तब तब युधिष्ठिर मेरा दावं लगाता है ,
जब हर जीत का होता है यहाँ  खेल कोई
मै आँखे मीचे खड़ी बेबस पांडव प्यारी हूँ ..

हर राम के साथ वनवास को जाती हूँ मै
और चुपचाप हर दुःख दर्द सह जाती हूँ मै
फिर भी परख मेरे चरित्र की होती है
तब चुपचाप  आग में खड़ी जनक-कुमारी हूँ .,,

जब जब पुरषार्थ किसी का हो जाता है छिन्न-भिन्न
तब तब मै पुकारी जाती हूँ चरित्रहीन
चुपचाप इसे  सुनकर मुझको शर्म खुद पर ही आती है
की क्यूँ नारी ही सारी दुनिया मै चरित्रहीन पुकारी जाती है ??

 चुपचाप प्रसव  पीड़ा नारी सह जाती है ,
हर दर्द वो बिना शिकन के सह जाती है ,
क्यूँ नारी हूँ? इसी संशय में रह जाती है ,
और समाज  में अबला खुद को कह जाती है ??

जब जब मैंने अपना भाव व्यक्त किया है
तब तब इस समाज ने रंजित रक्त किया है
जब जब कोई लक्ष्मण आवेश  में आता है
मै नाक कटी  शूर्पनखा   दुखियारी हूँ ,

पूछती हूँ मै मुझे कोख में मारने वालों से ,
क्यूँ हर घर में जलती  आई हूँ ,सालों-सालों से ??
नफरत करती हूँ मै मंदिर मस्जिद शिवालों से ,
नफरत है मुझको इन मूर्ति पूजने वालों से ..

कहने को कोई मुझको दुर्गा-काली का अवतार कहे
या लक्ष्मीरूपा और सरस्वती कोई  मुझको बार-बार कहे
छोड़ दो तुम अब किसी देवी के चरणों पे गिरना
कोख से फेंकी हुई हर नवजात बात यही बार बार कहे

व्यभिचारी  बन जब समाज  यहाँ कोई जीता है
क्या उसके लिए नही कोई धर्मग्रन्थ,कुरान और गीता है .?????


( नारी-जगत  को समर्पित मेरी आगामी काव्यसंग्रह  " नारी तू नारायणी " से )
( सर्वाधिकार सुरक्षित द्वारा राजीव कुमार पाण्डेय )

दिल आज अब करता है मेरा थोडा-थोडा


वो हमे देख के मुस्कुराते हैं अब भी थोडा-थोडा ,
और हम ये सोच के रह जाते हैं कि दिल क्यूँ तोडा,



जो सीने से लगा करते थे दौड़ के आकर ,
वो दूर हुए क्यूँ और आखिर क्यूँ मुह मोड़ा,

लगता है मुझको भी अब कुछ-कुछ और थोडा-थोडा ,
कि उसने नही मैंने ही उसका दिल तोडा,

मुझे पता ना था की वो ख्वाहिस -ए- जिस्म लेके आते थे ,
हम तो बेवजह उनकी आँखों में डूब जाते थे ,

अब वो दूर हैं तो महसूस होता है थोडा थोडा
कि ख्वाहिस-ए-जिस्म कि उनकी मैंने क्यूँ तोडा

उनकी होठों कि प्यास क्यूँ ना मैंने महसूस किया
बे आबरू होने कि उनकी चाहत को मैंने क्यूँ छोड़ा ????????

दिल आज अब करता है मेरा थोडा-थोडा,
कि वो लबों पे लब रखे और मै बाँहों में भरूं उसको ,
और रात बीते चुपके चुपके , धीर धीरे और थोडा-थोडा ..

From my lover's poem collection " Tere Liye "

Saturday, 10 September 2011

कौन भिखारी ?

मैंने  देखा ,
 वो  कुछ  मांग  रही  थी
शायद वह  कुछ  मांग  ही  रही  थी  ,
मैले   कुचैले  पते   वसन   में
लज्जा  से  मारे  सिकुडे  तन  में
आंसू  भरे  हुए  नयन  में
 वो  वुभुक्षा कि  आग  में  जल  रही  थी
प्रकृति कि  क्रूरता मे  पल  रही  थी  
आदमियत का  माखौल उडाते  हुए
खुद  को  जानवर में  बदल  रही  थी
इंसानियत को  जानवर  में  बदल  रही  थी
इंसानियत  को  शायद यही  बात  खल  रही  थी
अपने  मैले  पते  वसन  से
अपने  तन  को   ढँक  रही  थी
पेट  के  खातिर ही  सही
 हाथ  सबके  सामने  पटक  रही  थी  .
अदम्य  क्रूरता  की  प्रतीक  थी  नारी
दुसहासी  थी  या   थी भूख  की  मारी
लोग  कह   रहे  थे  उससे
दूर  हटो  तुम  , अरे  भिखारी   !
दूसरी  ओर  मैंने  जो  देखा
समाज  भी  भूखा  ही  था
पेट  का ??
 नही  नही वासना  का  
वह  मांग  रहा  था  वासना  की  भीख
समाज  की  आँखों में  दया  भी  ना  थी
लोक  लाज  और  ह्या  भी  ना  थी
वह  चला   रहा  था   फब्तियों  का  तीर
जो  बढा  रहा  था    कलेजे का  पीर
वह  हंस  रहा  था
दुसरे  की  बेबसी  पर
दुसरे  की  तड़प  पर
और  शायद
अपनी  असमर्थता   और कायरता पर भी ,
आज मै सोचता  हूँ
क्या था ? मै उस दिन
 उसकी सहायता  का अधिकारी    ?
कौन था भिखारी ?
वह  समाज   या  वह  बेबस  नारी  ???